Kahar Samaj History कहार समाज का इतिहास

कहार समाज भारत के उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, झारखंड, राजस्थान, ओडिशा, छत्तीसगढ़, गुजरात और महाराष्ट्र राज्यों में पाए जाने वाले एक मुख्य जाति है। इस समाज को काश्यप ऋषि की संतानों से जाति प्राप्ति हुई माना जाता है।

इस समाज के लोग अपनी आबादी के आधार पर भूमिहीन होते हैं और मुख्य रूप से नदियों और झीलों के आसपास रहते हैं। इस समाज के लोगों की प्रमुख धर्म हिंदू होती है।

कहार जाति के महत्व को इस बात से समझा जा सकता है कि पुराने समय में जब डाकुओं का प्रचलन जोरों पर था. ये डाकू रास्ते में दुल्हन की डोली और गहने जेवर लूट लिया करते थे. डोली की रक्षा के लिए कहर दल का गठन किया गया था जो दुल्हन की डोली को सुरक्षित अपने गंतव्य पर पहुंचाते थे.

कहार समाज भारत में एक प्रमुख जाति समुदाय है, जिसका इतिहास विभिन्न युगों में उनके सामाजिक और आर्थिक विकास के साथ जुड़ा हुआ है। यह समाज कई राज्यों में पाया जाता है, जिनमें उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान, झारखंड और ओडिशा शामिल हैं।

कहार शब्द का उल्लेख प्राचीन समय में मिलता है, और संभवतः यह शब्द काठी या बास्कर जैसी वायदी संस्कृति से संबंधित है। इस समाज का प्रमुख व्यवसाय जलधनुष और नाव-निर्माण (boat-building) है।

कहार समाज के लोग अपनी परंपरागत धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों को बहुत मानते हैं। उनके पास अपना विशेष संस्कृति और गीत-संगीत का भाग्यशाली इतिहास है।

इतिहास के प्रारंभिक दौर में, कहार समाज के लोग मुख्य रूप से जलधनुष निर्माण और नाविक के रूप में अपने व्यवसाय से जुड़े रहे हैं। सम्राट अशोक के समय से यह जाति काम के लिए सम्मानित थी।

मध्यकालीन काल में, इस समाज के लोगों को बारहसिंघारे व राजा के दरबारों में नौकरी मिलती थी और वे अपने नौकरी से अपने परिवार को आर्थिक सहायता प्रदान करते थे।

ब्रिटिश शासन के समय में, कहार समाज के लोगों को नौकरी और रोजगार में कई समस्याओं का सामना करना पड़ा, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति प्रभावित हुई।

स्वतंत्रता के बाद, कहार समाज के लोग सामाजिक और आर्थिक रूप से सुधार के पथ पर चले और शिक्षा के क्षेत्र में भी उनकी स्थिति सुधारी। आज, कहार समाज के लोग विभिन्न व्यापार और नौकरी में लगे हुए हैं और समाज के विभिन्न क्षेत्रों में अपने योगदान के माध्यम से विकास में योगदान दे रहे हैं।